1Mediummains60 marks
Compulsory Language
निम्नलिखित गद्यांश की संक्षेपिका (Precis) लगभग 190-210 शब्दों में लिखिए। इसके लिए दिए गए विशेष पन्नों का प्रयोग कीजिए। यदि शब्द सीमा का उल्लंघन स्वीकार्य सीमा से अधिक है तो उसी अनुपात में अंक काटे जाएँगे। यदि संक्षेपिका 150 शब्दों से कम या 250 शब्दों से अधिक लम्बी हुई तो उसके लिए अंक बिल्कुल नहीं दिए जा सकते हैं।
मैं उस समय लगभग सात वर्ष का रहा होऊँगा जब मेरे पिता राजस्थानिक न्यायालय का सदस्य बनने के लिए पोरबंदर से राजकोट चले आए। वहाँ मुझे एक प्राथमिक विद्यालय में भर्ती करा दिया गया और मुझे उन दिनों की अच्छी तरह याद है, मुझे पढ़ाने वाले शिक्षकों के नाम तथा अन्य विशेषताएं भी याद हैं। जैसा पोरबंदर में था उसी प्रकार यहाँ भी मेरी पढ़ाई के विषय में कोई विशेष उल्लेखनीय बात नहीं। मैं तो केवल एक औसत दर्जे का विद्यार्थी था। इस विद्यालय से मैं एक उपनगरीय विद्यालय में गया और वहाँ से हाई-स्कूल। तब तक मैं बारह वर्ष का हो चुका था। मुझे याद नहीं कि इस थोड़े से समय में मैंने अपने अध्यापकों अथवा सहपाठियों से कभी भी झूठ बोला हो। मैं बहुत शर्मीला था और सभी प्रकार के लोगों के साथ से बचा करता था। मेरी पुस्तकें तथा मेरे पाठ ही मेरे एकमात्र साथी होते थे। ठीक समय पर स्कूल में होना और स्कूल बंद होते ही घर भाग आना—यही मेरी प्रतिदिन की आदत थी। मैं वस्तुत: वापस भागा ही करता था, क्योंकि मैं किसी से बातचीत नहीं कर सकता था। मुझे इस बात का भी डर था कि कहीं कोई मेरा मज़ाक न बनाए।
एक घटना ऐसी है जो मेरे हाई-स्कूल के पहले वर्ष की परीक्षा के दौरान घटी और जो उल्लेखनीय है। शिक्षा निरीक्षक मिस्टर जाइल्स निरीक्षण के लिए दौरे पर आए हुए थे। वर्तनी अभ्यास (Spelling exercise) के लिए उन्होंने हमें पांच शब्द लिखने को दिए। इनमें से एक शब्द था 'Kettle'। मैंने उसकी वर्तनी गलत लिखी हुई थी। मेरे अध्यापक ने अपने जूते के द्वारा मुझे उसे ठीक करने के लिए संकेत देने का प्रयास किया, लेकिन मुझे यह सहायता नहीं लेनी थी। यह बात मेरी समझ से परे थी कि वे यह चाहते थे कि मैं अपने पास वाले विद्यार्थी की स्लेट पर से स्पेलिंग की नकल कर लूं क्योंकि मैं तो यह सोचता था कि अध्यापक वहाँ इसलिए हैं कि हमें नकल करने से रोकने के लिए हमारा निरीक्षण करते रहें। परिणाम यह हुआ कि मेरे अतिरिक्त अन्य सभी लड़कों के द्वारा लिखे गए प्रत्येक शब्द की स्पेलिंग सही पाई गई। केवल मैं ही बेवकूफ़ रहा। बाद में शिक्षक महोदय ने इस बेवकूफी की बात मुझे समझाने का प्रयत्न किया किंतु उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मैं 'नकल' करने की कला कभी सीख नहीं पाया।
फिर भी इस घटना से मेरा अपने अध्यापक के प्रति सम्मान बिल्कुल कम नहीं हुआ। मैं स्वभाव से ही दूसरों के दोष नहीं देखता था। बाद में मुझे इन अध्यापक महोदय की कई अन्य दुर्बलताओं का पता चला, किंतु उनके प्रति मेरा सम्मान वही बना रहा। इसका कारण यह था कि मैंने बड़ों की आज्ञा का पालन करना सीखा था, उनके कार्यों का विश्लेषण करना नहीं। इसी कालावधि से जुड़ी दो अन्य घटनाएं मेरी स्मृति में हमेशा बनी रही हैं। विद्यालय के लिए निर्धारित पुस्तकों के अतिरिक्त और कुछ भी पढ़ने से मुझे नियमित रूप से अरुचि थी। प्रतिदिन का निर्धारित अध्ययन तो करना ही था क्योंकि मुझे अध्यापक द्वारा दंडित किया जाना उतना ही नापसंद था जितना कि उन्हें धोखा देना। इसलिए मैं प्राय: बिना उनमें मन लगाए हुए अपने पाठ पूरे कर लेता था। इस प्रकार जब मेरे पाठ ही पूरे सम्यक् रूप से नहीं तैयार होते थे तो अतिरिक्त अध्ययन का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता था। लेकिन मेरे पिताजी द्वारा खरीदी गई एक पुस्तक पर मेरी दृष्टि किसी प्रकार पड़ गई। वह पुस्तक थी 'श्रवण पितृभक्ति नाटक' (श्रवण का उनके माता-पिता के प्रति भक्तिभाव के विषय में नाटक) मैंने उसे गहरे मनोयोग के साथ पढ़ा। उसी समय हमारे यहाँ घुमंतू कलाकार आए। मुझे दिखाए जाने वाले चित्रों में से एक श्रवण का था जो अपने कंधों पर पड़ी हुई झोली की सहायता से अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर ले जा रहे थे। इस पुस्तक तथा चित्र ने मेरे मन पर एक अमिट छाप छोड़ी। मैंने अपने आप से कहा, "यह ऐसा उदाहरण है जिसकी तुम्हें नकल करनी चाहिए"। श्रवण की मृत्यु पर उनके माता-पिता का करुण रुदन आज भी मेरी स्मृति में ताजा है। उसकी द्रवित कर देने वाली धुन ने मुझे गहराई तक प्रभावित किया और इस धुन को मैंने पिताजी के द्वारा मेरे लिए खरीदे गए बाजे पर बजाया।