1Mediummains60 marks
Compulsory Language
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उसकके आधार पर, उसके नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट और शुद्ध भाषा में दीजिए। 12×5 = 60
वैश्विक पैमाने पर लोगों की एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की प्रक्रिया शताब्दियों पहले शुरू हुई थी जबमनुष्य जाति ने समूहों में एक क्षेत्रा से दूसरे क्षेत्रा में विभिन्न कारणों से जाना शुरू किया है। ये कारण थे-चारागाहों अथवा कृषियोग्य भूमि की तलाश, निष्ठुर शासन अथवा यंत्राणा से पलायन, विचार अथवा अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता की चाहत अथवा मात्रा घूमने की लालसा। आप्रवास अपने सामान की तरह अपने सांस्कृतिक अधिपत्य को संजोते हैं और मार्ग में अथवा नयी व्यवस्था में उसे प्रोन्नत करने का प्रयत्न करते हैं। मार्ग में मिलने वाली दूसरी जनजातियों से वे या तो युद्ध या व्यापार या विवाह या समान उपक्रमों के माध्यम से साहचर्य स्थापित करते हैं। शुरूआत में वाग्युद्ध का तनावपूर्ण समय रहता है, कुछ समय बाद वातावरण शान्त हो जाता है और शान्ति अपने पूरे कौशल एवं रचनात्तमक के साथ फलने-फूलने लगती है। लेन-देन सम्बन्धों का आधार बन जाता है। किसी भी संस्कृति के अधिपत्य के बिना एक स्वतंत्रा वातावरण में प्रत्येक समूह एक बहुमुखि समाज के रूप में पनपता है। अतः स्मभव है कि मंगोलिया के लोग अलास्का चले गए हों, एंग्लो-सेक्सन ब्रिटेन में बस गए हों, शायद हज़रत मूसा ने चुने हुए लोगों का पवित्रा या पूर्व-निर्धारित भूमि की तलास में नेतृत्व किया हो। शायद कोलम्बस ने यूरोपीय देशों को वैश्विक दुस्साहस की ओर अभिमुख करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। तभी से उपनिवेशवाद दूसरे देशों एवं संस्कृतियों को जीतने का एक साधन बन गया और इन विजित देशों को विजेताओं के प्रभुत्व में लाने लगा। आज व्यापार और धंधा बड़े पैमाने पर लोगों के एक देश से दूसरे देश को स्थानान्तरण के शक्तिशली कारण है। प्रत्येक समूह पूर्वजों का अन्तर्बोध, पुराने घर की मीटी-स्मृति, एक बीतहे हुए समय को संजोए रखता है। एक या दो पीढ़ी गुज़र जाने के बाद सम्मिलन पुराने सम्बन्धों-सम्पर्को के बहुत थोड़े निशान रहने देता है। शायद अगली शताब्दी में कोई यह भविष्यवाणी करने का खतरा उठाए कि दुनिया की आबादी अपनी पुरानी क्षेत्रिए पहचान को जीवित रखने में बहुत कठिनाई अनुभव करेगी। जिस समय हम जहां रहते हैं, वही हमारा क्षेत्रा हो जाता है। हम नए स्थान के रंग-गंध के आदी हो जाते है। स्थानिकता वैश्विकता में घुल-मिल जाती है। आने वाले समय में बहुत-से थोड़े लोग ही रह जाएँगे जो अपनी पुरानी अस्मित ाके बचाए रख सकने में सफल होंगे। नयी व्यवस्था समूचे तंत्रा को सर्वत्रा नीवकृत कर देगी। पहले से ही पुरानी मान्यताओं से मुक्त पीढ़ियाँ भविष्योन्मुख है एवं खोई हुई अस्मिताओं को संजोए रखने की भावुकता से पूर्णतया मुक्त है। कोई भी संस्कृति या पुरूष या स्त्राी पृथकतावाद में नहीं रह सकता । केन्द्र की ओर से आने की प्रवृति वाली और केन्द्र से हटने की प्रवृति वाली शक्तियाँ थोड़े समय के लिए ही रह सकती हैं, असंख्य पिढ़ियों ने भले ही यह प्रार्थना की हो कि प्रत्येक नागरिक की वैयक्किता बनी रहे, अपनी आस्था में वह सुरक्षित रहें और बाहरी प्रभावों से अपने को पूर्णतया मुक्त रखे लेकिन तब भी हम भली-भांति जानते हैं कि हम अत्यधिक संवेदनशील, क्षतिग्रस्त के भय से आक्रान्त, छिद्रपूर्ण, अयाचित प्रतिक्रियाओं और उतरों के प्रति संग्रहणशील और अनाश्रित हैं और कभी तुरन्त आश्रित भी। 'जीन्स', 'डी. एन. ए.' और 'आर. एन. ए.' पहले से ही सुगठित हैं, प्रत्येक ज्ञान-तन्तु यह जानती है कि पहले क्या हो चुका है। शरीर और मस्तिष्क दूसरों के विचारों, कथनों और कार्याें के प्रति ग्रहणशील हैं। अनभिज्ञता भय पैदा करती है, भय घृणा उत्पन्न करता है, घृणा आत्वविश्वास को नष्ट करती है और यह सब हमें हृास और मृत्यु की ओर ले जाता है। अतीत में बहुत-सी प्राचीन संस्कृतियों इसी प्रकार के अन्त की ओर उन्मुख हुई होंगी। जीवित रहने के लिए एक को दूसरे के प्रति ग्रहणशील होना ही होगा, भले ही दूसरा कितना भी दोषपूर्ण क्यों न हो।