4 October 2026 को, Justice Ujjal Bhuyan ने NALSAR University of Law में आयोजित मूट कोर्ट प्रतियोगिता में विदाई संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार भारत की मूल संरचना का संवैधानिक हिस्सा है और चेतावनी दी कि किसी भी बड़े पैमाने पर मतदाता हटाने से मनमाना कार्य होगा और Article 326 का उल्लंघन होगा। उनके टिप्पणी ने इस दीर्घकालिक बहस को फिर से जगा दिया कि एक sitting judge कितनी हद तक उन मुद्दों पर बोल सकता है जो बाद में अदालत के समक्ष आ सकते हैं।
मुख्य विकास
- जस्टिस भुयन ने Representation of the People Act, 1950 का उल्लेख किया और यह ज़ोर दिया कि किसी भी मतदाता को हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई की आवश्यकता है, सिवाय मृत्यु के मामलों के।
- पूर्व मुख्य न्यायाधीश B.R. Gavai और पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीशों ने चेतावनी दी कि एक sitting judge द्वारा sub‑judice मुद्दे पर टिप्पणी करना न्यायिक शिष्टाचार का उल्लंघन कर सकता है।
- 5 October 2026 को, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई की, जिसमें 22 लाख से अधिक मतदाता पुनर्स्थापना की मांग कर रहे थे।
- अंतर्राष्ट्रीय मानक जैसे Bangalore Principles of Judicial Conduct न्यायाधीशों को कानून पढ़ाने और लिखने की अनुमति देते हैं, लेकिन लंबित मामलों पर टिप्पणी करने से सावधान करते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
Restatement of Values of Judicial Life (Clause 8) स्पष्ट रूप से न्यायाधीशों को राजनीतिक मामलों या उन मुद्दों पर विचार व्यक्त करने से रोकता है जो न्यायिक निर्णय के लिए उत्पन्न हो सकते हैं। हालांकि, इसका कोई प्रत्यक्ष दंड नहीं है और यह निर्णयों में संदर्भ के रूप में उपयोग किया जाता है।
मई 2026 में, सुप्रीम कोर्ट ने Association for Democratic Reforms v Election Commission of India मामले में पुनः पुष्टि की कि मतदान एक संवैधानिक अधिकार है लेकिन पूर्ण नहीं है, और नोटिस और सुनवाई (Rule 21A of the Registration of Electors Rules, 1960) जैसे प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय हटाने से पहले अनिवार्य हैं।
तुलनात्मक रूप से, यू.एस. सुप्रीम कोर्ट के 2023 कोड ऑफ कंडक्ट में न्यायाधीशों को कानूनी विषयों पर बोलने की अनुमति है लेकिन लंबित मामलों के मूलभूत पहलुओं पर नहीं। ब्रिटिश अनुभव