अवलोकन
18 April 2026 को, Senior Advocate Rajeev Dhavan ने Supreme Court के नौ‑जज बेंच के सामने यह तर्क रखा कि Article 25 और Article 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के निर्धारण के लिए सही परीक्षण यह होना चाहिए कि कोई विश्वास bona‑fide है या नहीं, न कि वह धर्म के लिए “essential” है या नहीं। यह तर्क Sabarimala Temple विवाद और भविष्य में धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों पर व्यापक प्रभाव डालता है।
Key Developments
- Dhavan ने तर्क दिया कि “essential religious practice” सिद्धांत खतरनाक है क्योंकि अदालतों को मुकदमे की शुरुआत में ही किसी धर्म के सार को निर्धारित करने को कहा जाता है।
- उन्होंने Bijoe Emmanuel v. State of Kerala (1986) का हवाला देकर यह दिखाया कि संविधान अल्पसंख्यक विश्वासों को भी संरक्षित करता है जब वे ईमानदारी से रखे गए हों।
- उन्होंने अंग्रेजी मामला R. (Williamson) v Secretary of State for Education and Employment का उल्लेख किया, जो दावेदार के विश्वास की वास्तविकता तक ही न्यायिक जांच को सीमित करता है।
- Dhavan ने तर्क किया कि Article 25(2) में “nothing in this article” वाक्यांश का उद्देश्य व्यक्तिगत अधिकारों को सामाजिक सुधार में बाधा न बनने देना है।
- उन्होंने कहा कि proportionality परीक्षण को Articles 25 और 26 के एकीकरण का मार्गदर्शन करना चाहिए, न कि एक पदानुक्रमित अधीनता का।
- Dhavan ने Sabarimala बहुमत की “exclusive distinctiveness” के पाँचवें परीक्षण को जोड़ने की आलोचना की, इसे एक त्रुटि बताया जिसे निरस्त किया जाना चाहिए।
Important Facts
The bench hearing the case comprised CJI Surya Kant and Justices BV Nagarathna, MM Sundresh, Ahsanuddin Amanullah, Aravind Kumar, Augustine George Masih, Prasanna B Varale, R Mahadevan and Joymalya Bagchi. The hearing was on its fifth day. Dhavan also highlighted that s
