Key Insight
Supreme Court ने Sabarimala संदर्भ को संवैधानिक मुद्दों तक सीमित किया, लिंग‑समानता बहस को जन्म दिया
Key Facts
- Supreme Court के 9‑जज बेंच ने 13 May 2026 को Sabarimala संदर्भ को सुना (संदर्भ का Day 15)।
- बेंच ने स्पष्ट किया कि वह 2018 के Sabarimala निर्णय की समीक्षा नहीं करेगा, बल्कि केवल संवैधानिक प्रश्नों पर विचार करेगा।
- Justice N. V. Ramana और Justice B. V. Nagarathna बेंच के उन जजों में शामिल थे जिन्होंने संदर्भ को सुना।
- Justice Nagarathna ने कहा कि "एक महीने में तीन दिन के लिए अस्पृश्यता नहीं हो सकती" जबकि Article 17 की लागूता पर चर्चा कर रही थीं।
- Solicitor General R. Venkataramani ने कोर्ट को बताया कि India पितृसत्तात्मक नहीं है जैसा पश्चिम लिंग रूढ़ियों को समझता है।
- संदर्भ को Article 143(1) के तहत संविधान में बुलाया गया था ताकि इस मामले पर कोर्ट की सलाहकार राय ली जा सके।
Background
Sabarimala विवाद में लिंग समानता की संवैधानिक गारंटी (Articles 14, 15, 25) को धार्मिक स्वतंत्रता के दावों के खिलाफ रखा गया है। Supreme Court का संदर्भ इस तनाव को अपने 2018 के निर्णय को उलटे बिना सुलझाने का प्रयास करता है, जो मौलिक अधिकारों और व्यक्तिगत कानून की व्याख्या में न्यायपालिका की भूमिका को उजागर करता है।
Mains Angle
GS II – राजनीति: संदर्भ को केवल संवैधानिक प्रश्नों तक सीमित करने के प्रभावों का विश्लेषण करें, धार्मिक स्वतंत्रता और लिंग समानता के संतुलन पर, और संवैधानिक न्यायशास्त्र में सलाहकार संदर्भों की भूमिका का मूल्यांकन करें।