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Supreme Court ने 7 साल तक के गैर‑जमानती अपराधों के लिए Section 480(3) शर्तों के बिना जमानत की अनुमति दी

Supreme Court bench of Justices J.K. Maheshwari and Atul S. Chandurkar ने फैसला दिया कि सात साल तक की सजा वाले गैर‑जमानती अपराधों के लिए Section 480(3) of the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita को लागू किए बिना जमानत दी जा सकती है। यह निर्णय, MP Excise Act के तहत अपील सुनते समय दिया गया, जमानत मामलों में न्यायिक विवेक को स्पष्ट करता है और UPSC Polity और Law अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।
The Supreme Court ने स्पष्ट किया कि सात साल तक की सजा वाले non‑bailable offences के लिए, जमानत Section 480(3) of the BNSS में निर्धारित शर्तों को लागू किए बिना दी जा सकती है। यह टिप्पणी Justice J.K. Maheshwari और Justice Atul S. Chandurkar की बेंच से आई, जो MP Excise Act के तहत एक आरोपी को जमानत प्रदान करने के अपील को सुन रही थी। Key Developments सात साल तक की अधिकतम सजा वाले गैर‑जमानती अपराधों के लिए, अदालत Section 480(3) की जमानत शर्तों को छोड़ सकती है। यह निर्णय MP Excise Act के तहत जमानत से संबंधित अपील सुनते समय दिया गया। यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के संतुलन के लिए अदालतों की विवेक शक्ति को रेखांकित करता है। Important Facts भारत में जमानत ढांचा पारंपरिक रूप से बाइलेबल और गैर‑जमानती अपराधों में अंतर करता है। BNSS की Section 480(3) ने बाद वाले के लिए कड़ी शर्तें निर्धारित की थीं, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता के दुरुपयोग को रोकना था। सात साल तक की सजा वाले अपराधों के लिए इन शर्तों में छूट देने से, कोर्ट लचीलापन लाता है जबकि आपराधिक न्याय प्रणाली के उद्देश्यों की रक्षा करता है। UPSC Relevance यह निर्णय GS Paper II (Polity) के लिए प्रासंगिक है क्योंकि यह न्यायपालिका के कार्य, वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या, और न्यायिक विवेक के सिद्धांत को दर्शाता है। यह GS Paper III (Law) के अवधारणाओं जैसे अपराधों का वर्गीकरण और जमानत न्यायशास्त्र को भी छूता है। अभ्यर्थियों को वैधानिक कानून (BNSS) और न्यायिक घोषणाओं के बीच अंतःक्रिया पर ध्यान देना चाहिए, जो UPSC के कानूनी सुधार और आपराधिक न्याय पर प्रश्नों में बार-बार आता है। Way Forward Legal scholars anticipate that l
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Overview

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Supreme Court ने सात साल तक के गैर‑जमानती अपराधों के लिए जमानत विवेक को विस्तारित किया

Key Facts

  1. Supreme Court (bench of Justices J.K. Maheshwari & Atul S. Chandurkar) ने कहा कि 7 साल तक की सजा वाले गैर‑जमानती अपराधों के लिए Section 480(3) of the BNSS को लागू किए बिना जमानत दी जा सकती है।
  2. Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita की Section 480(3) सभी गैर‑जमानती अपराधों के लिए कड़ी जमानत शर्तें निर्धारित करती है।
  3. यह निर्णय Madhya Pradesh Excise Act के तहत जमानत से संबंधित अपील सुनते समय आया।
  4. यह निर्णय सात साल या उससे कम की अधिकतम सजा होने पर Section 480(3) की शर्तों को छोड़ने के लिए न्यायिक विवेक प्रस्तुत करता है।
  5. निचली अदालतों से अपेक्षा है कि वे इस मिसाल का पालन करें, जिससे भारत में अधिक लचीला जमानत प्रणाली बन सकती है।
  6. Legal scholars सुझाव देते हैं कि Section 480(3) की विधायी समीक्षा की जाए ताकि Supreme Court के विवेकपूर्ण दृष्टिकोण को संहिताबद्ध किया जा सके।

Background & Context

यह निर्णय भारत के आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन को स्पष्ट करता है, BNSS के वैधानिक प्रावधानों को Supreme Court की व्याख्या शक्ति से जोड़ता है—जो GS Paper II (Polity) और GS Paper III (Law) में एक मुख्य विषय है।

Mains Answer Angle

Mains उत्तर में, चर्चा करें कि संविधान के तहत न्यायिक विवेक कैसे वैधानिक कठोरता को संतुलित कर सकता है, इस निर्णय को उदाहरण के रूप में उद्धृत करते हुए; यह GS Paper II (Polity) और GS Paper III (Law) के लिए प्रासंगिक है।

Full Article

<p>The <span class="key-term" data-definition="Supreme Court — India’s apex judicial body, final interpreter of the Constitution and ultimate authority on legal matters (GS2: Polity)">Supreme Court</span> ने स्पष्ट किया कि सात साल तक की सजा वाले <span class="key-term" data-definition="non‑bailable offence — an offence where bail is not a matter of right; release is at the discretion of the court (GS2: Polity)">non‑bailable offences</span> के लिए, जमानत <span class="key-term" data-definition="Section 480(3) — provision in the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita prescribing specific conditions for bail in non‑bailable cases (GS2: Polity)">Section 480(3)</span> of the <span class="key-term" data-definition="Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS) — a comprehensive criminal law code that consolidates and modernises India’s criminal statutes (GS2: Polity)">BNSS</span> में निर्धारित शर्तों को लागू किए बिना दी जा सकती है। यह टिप्पणी <strong>Justice J.K. Maheshwari</strong> और <strong>Justice Atul S. Chandurkar</strong> की बेंच से आई, जो <span class="key-term" data-definition="MP Excise Act — Madhya Pradesh state legislation governing excise duties on goods, often invoked in cases of illegal production or sale (GS3: Economy, GS2: Polity)">MP Excise Act</span> के तहत एक आरोपी को जमानत प्रदान करने के अपील को सुन रही थी।</p> <h3>Key Developments</h3> <ul> <li>सात साल तक की अधिकतम सजा वाले गैर‑जमानती अपराधों के लिए, अदालत Section 480(3) की जमानत शर्तों को छोड़ सकती है।</li> <li>यह निर्णय MP Excise Act के तहत जमानत से संबंधित अपील सुनते समय दिया गया।</li> <li>यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के संतुलन के लिए अदालतों की विवेक शक्ति को रेखांकित करता है।</li> </ul> <h3>Important Facts</h3> <p>भारत में जमानत ढांचा पारंपरिक रूप से बाइलेबल और गैर‑जमानती अपराधों में अंतर करता है। BNSS की <span class="key-term" data-definition="Section 480(3) — provision in the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita prescribing specific conditions for bail in non‑bailable cases (GS2: Polity)">Section 480(3)</span> ने बाद वाले के लिए कड़ी शर्तें निर्धारित की थीं, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता के दुरुपयोग को रोकना था। सात साल तक की सजा वाले अपराधों के लिए इन शर्तों में छूट देने से, कोर्ट लचीलापन लाता है जबकि आपराधिक न्याय प्रणाली के उद्देश्यों की रक्षा करता है।</p> <h3>UPSC Relevance</h3> <p>यह निर्णय <strong>GS Paper II (Polity)</strong> के लिए प्रासंगिक है क्योंकि यह न्यायपालिका के कार्य, वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या, और न्यायिक विवेक के सिद्धांत को दर्शाता है। यह <strong>GS Paper III (Law)</strong> के अवधारणाओं जैसे अपराधों का वर्गीकरण और जमानत न्यायशास्त्र को भी छूता है। अभ्यर्थियों को वैधानिक कानून (BNSS) और न्यायिक घोषणाओं के बीच अंतःक्रिया पर ध्यान देना चाहिए, जो UPSC के कानूनी सुधार और आपराधिक न्याय पर प्रश्नों में बार-बार आता है।</p> <h3>Way Forward</h3> <p>Legal scholars anticipate that l</p>
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Analysis

Practice Questions

GS1
Easy
Prelims MCQ

अपराध न्याय सुधार

1 marks
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GS2
Medium
Mains Short Answer

न्यायिक विवेक और आपराधिक प्रक्रिया

10 marks
5 keywords
GS2
Hard
Mains Essay

अपराध न्याय सुधार

25 marks
6 keywords
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Quick Reference

Key Insight

Supreme Court ने सात साल तक के गैर‑जमानती अपराधों के लिए जमानत विवेक को विस्तारित किया

Key Facts

  1. Supreme Court (bench of Justices J.K. Maheshwari & Atul S. Chandurkar) ने कहा कि 7 साल तक की सजा वाले गैर‑जमानती अपराधों के लिए Section 480(3) of the BNSS को लागू किए बिना जमानत दी जा सकती है।
  2. Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita की Section 480(3) सभी गैर‑जमानती अपराधों के लिए कड़ी जमानत शर्तें निर्धारित करती है।
  3. यह निर्णय Madhya Pradesh Excise Act के तहत जमानत से संबंधित अपील सुनते समय आया।
  4. यह निर्णय सात साल या उससे कम की अधिकतम सजा होने पर Section 480(3) की शर्तों को छोड़ने के लिए न्यायिक विवेक प्रस्तुत करता है।
  5. निचली अदालतों से अपेक्षा है कि वे इस मिसाल का पालन करें, जिससे भारत में अधिक लचीला जमानत प्रणाली बन सकती है।
  6. Legal scholars सुझाव देते हैं कि Section 480(3) की विधायी समीक्षा की जाए ताकि Supreme Court के विवेकपूर्ण दृष्टिकोण को संहिताबद्ध किया जा सके।

Background

यह निर्णय भारत के आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन को स्पष्ट करता है, BNSS के वैधानिक प्रावधानों को Supreme Court की व्याख्या शक्ति से जोड़ता है—जो GS Paper II (Polity) और GS Paper III (Law) में एक मुख्य विषय है।

Mains Angle

Mains उत्तर में, चर्चा करें कि संविधान के तहत न्यायिक विवेक कैसे वैधानिक कठोरता को संतुलित कर सकता है, इस निर्णय को उदाहरण के रूप में उद्धृत करते हुए; यह GS Paper II (Polity) और GS Paper III (Law) के लिए प्रासंगिक है।

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