Supreme Court ने स्पष्ट किया है कि निचली अदालत Anticipatory Bail को खारिज करने के बाद आरोपी को सॉरेंडर करने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। यह निर्णय झारखंड के एक भूमि‑विवाद मामले में धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप में आरोपी व्यक्ति की याचिका से उत्पन्न हुआ।
Key Developments
- दो‑जजों की बेंच (Justices JB Pardiwala और Ujjal Bhuyan) ने कहा कि परीक्षण अदालत से पहले याचिकाकर्ता को सॉरेंडर करने का निर्देश देना अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
- अदालत ने दोहराया कि यदि मजिस्ट्रेट ने संज्ञान ले लिया है, तो सामान्य प्रक्रिया summons जारी करना है, न कि अनिवार्य सॉरेंडर।
- Criminal Procedure Code (CrPC) की Section 87 केवल तब लागू होती है जब अदालत आरोपी के भागने के डर के कारणों को दर्ज करती है।
- पुलिस केवल गैर‑जमानती वारंट जारी होने के बाद ही गिरफ्तार कर सकती है; वे केवल शिकायत के आधार पर ऐसा नहीं कर सकते।
- Section 202 के तहत जांच के दौरान भी, वारंट न होने पर गिरफ्तारी प्रतिबंधित है।
- अदालत ने बिहार और झारखंड में समय से पहले Anticipatory Bail के आवेदन में बढ़ती प्रवृत्ति को नोट किया, जिससे Supreme Court तक अनावश्यक मुकदमेबाजी होती है।
Important Facts
- 2021 में दायर शिकायत में IPC Sections 323, 420, 467, 468, 471 और 120B पढ़कर 34 के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया था।
- Jharkhand High Court ने दूसरा Anticipatory Bail याचिका खारिज कर दी, यह कहते हुए कि कोई नई परिस्थितियां नहीं हैं।
- Supreme Court ने याचिका को आगे के आदेशों के बिना निपटाया और आदेश को बिहार और झारखंड के High Courts के Registrars General को प्रसारित करने का निर्देश दिया।
- केस संदर्भ: Petition for Special Leave to Appeal (Criminal) No.16221/2025, Om Prakash Chhawnika v. State of Jharkhand & Anr., citation 2026 LiveLaw (SC) 419.
Exam Relevance
बेल मामलों में न्यायिक शक्ति की सीमाओं को समझना GS‑2 (Polity) और GS‑1 (Indian Constitution) के लिए आवश्यक है। यह निर्णय प्रक्रियात्मक सुरक्षा को रेखांकित करता है