The Supreme Court on May 4, 2026 clarified that the writ jurisdiction under Article 226 cannot be invoked as a first‑step remedy to compel registration of a FIR. यह निर्णय वैधानिक आपराधिक‑प्रक्रिया ढांचे की प्रमुखता को सुदृढ़ करता है।
Key Developments
- Bombay High Court ने पुलिस को शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करने और FIR पंजीकृत करने का निर्देश दिया था।
- आरोपी ने Supreme Court में अपील की, जिसमें हाई Court द्वारा Article 226 के उपयोग को चुनौती दी गई, जबकि वैधानिक उपाय उपलब्ध थे।
- Supreme Court ने हाई Court के आदेश को निरस्त किया, यह मानते हुए कि शिकायतकर्ता ने वैकल्पिक कानूनी उपायों को समाप्त नहीं किया था।
Important Facts
विवाद तब उत्पन्न हुआ जब एक कंपनी ने आरोप लगाया कि नकली दस्तावेज़ों का उपयोग करके संपत्ति माप प्राप्त किया गया और उसके निदेशकों को राजस्व प्राधिकरणों के सामने प्रतिरूपित किया गया। कंपनी ने पहले Land Records Authority से संपर्क किया, जिसने जबरन कार्रवाई को अस्वीकार किया और शिकायतकर्ता को आपराधिक कानून ढांचे के तहत उपाय अपनाने की सलाह दी। इसके बावजूद, कंपनी ने पुलिस को बायपास करके Bombay High Court में लिखित याचिका दायर की, जिसमें FIR पंजीकरण के लिए निर्देश की मांग की गई।
Supreme Court बेंच, जिसमें Justice Sanjay Karol और Justice Augustine George Masih शामिल हैं, ने कहा कि शिकायतकर्ता ने पुलिस के Superintendent of Police या मजिस्ट्रेट से संपर्क नहीं किया, न ही यह दिखाया कि वैधानिक उपाय उपलब्ध नहीं हैं। कोर्ट ने जोर दिया कि लिखित अधिकार को “पहली बार” बुलाना वैधानिक योजना को विफल करता है और यह केवल जीवन या स्वतंत्रता के तत्काल खतरे के मामलों में ही अनुमति है।
Exam Relevance
यह निर्णय न्यायिक लिखित अधिकार और वैधानिक प्रक्रियाओं के बीच पदक्रम संबंध को दर्शाता है, जो Supreme Court न्यायशास्त्र में अक्सर चर्चा किया जाता है। अभ्यर्थियों को नोट करना चाहिए:
- सीमित दायरा