The Supreme Court ने 29 September 2026 को National Security Act (NSA) के तहत जारी किए गए रोकथामात्मक हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा दर्ज किया गया कबूलनाम, बिना किसी स्वतंत्र पुष्टि के, ऐसे हिरासत के लिए आवश्यक “subjective satisfaction” को पूरा नहीं कर सकता।
मुख्य विकास
- 29 Sept 2026 – Justice Dipankar Datta और Justice Sheel Nagu की बेंच ने कहा कि केवल पुलिस‑दर्ज किया गया कबूलनाम रोकथामात्मक हिरासत आदेश के लिए अपर्याप्त है।
- Section 3(2) के तहत आदेश रद्द किया गया और राज्य को ₹10 lakh की लागत चुकाने का आदेश दिया गया।
- यह मामला 24 Nov 2024 को Sambhal में हुई हिंसा से उत्पन्न हुआ, जहाँ मस्जिद सर्वेक्षण के दौरान चार लोग मारे गए।
- आरोपी को 17 Jan 2025 को गिरफ्तार किया गया, उसने कबूलनाम दिया, और बाद में 13 Oct 2025 को रोकथामात्मक रूप से हिरासत में रखा गया।
- घटना से संबंधित सभी आपराधिक मामलों को जून 2026 तक जमानती बना दिया गया; हिरासत ही एकमात्र शेष प्रतिबंध था।
महत्वपूर्ण तथ्य
मामले की पृष्ठभूमि
24 Nov 2024 को Sambhal, Uttar Pradesh में चार मौतें हुईं। आरोपी को 17 Jan 2025 को असंबंधित FIRs के कारण हिरासत में लिया गया। हिरासत में रहते हुए, पुलिस ने एक कबूलनाम दर्ज किया जिससे .32‑bore पिस्तौल बरामद हुई। जिला मजिस्ट्रेट ने 13 Oct 2025 को रोकथामात्मक हिरासत का आदेश दिया, जिसे बाद में राज्य ने 12 months के लिए पुष्टि की।
कानूनी सुरक्षा उपायों की जांच
कोर्ट ने दो संवैधानिक प्रावधानों की जांच की:
- Article 20(3) जो जबरन कबूलनाम को रोकता है।
- BSA की Section 23 जो पुलिस‑दर्ज किए गए कबूलनाम को साक्ष्य से बाहर करती है, सिवाय जब वह मजिस्ट्रेट के सामने किया गया हो या तथ्य उजागर करने में सहायक हो।
कोर्ट ने ज़ोर दिया कि पुलिस अधिकारी को दिया गया कबूलनाम दूषित माना जाता है और NSA के तहत आवश्यक “subjective satisfaction” का आधार नहीं बन सकता।