परिचय
On 20 August 2026 the Supreme Court ने PC‑PNDT Act के प्रवर्तन पर एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पुलिस इस अधिनियम के तहत अपराधों की स्वतंत्र रूप से जांच नहीं कर सकती; जिम्मेदारी विशेषीकृत Appropriate Authority के पास है। यह निर्णय हाई कोर्टों के बीच पुलिस की भूमिका को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद को सुलझाता है।
मुख्य विकास
- पुलिस संदिग्ध अवैध सेक्स‑डिटर्मिनेशन मामले की जानकारी दर्ज कर सकती है लेकिन उसे Appropriate Authority को अग्रेषित करना अनिवार्य है।
- केवल Appropriate Authority PC‑PNDT Act के तहत औपचारिक शिकायत दर्ज कर सकता है, जांच कर सकता है और कार्रवाई कर सकता है।
- पुलिस FIR PC‑PNDT अपराध की संज्ञान के लिए मजिस्ट्रेट के आधार नहीं बन सकती।
- यदि वही घटना भारतीय दंड संहिता (IPC) या अन्य आपराधिक अधिनियमों के तहत अलग अपराध भी शामिल करती है, तो पुलिस उस अपराध की स्वतंत्र रूप से जांच कर सकती है।
- PC‑PNDT Act की धारा 27, जो अपराधों को “संज्ञेय, गैर‑जमानती और गैर‑सम्पूर्ण” के रूप में वर्गीकृत करती है, को धारा 17, 28 और वह नियम जो पुलिस की भागीदारी को सीमित करता है, के साथ मिलाकर पढ़ना चाहिए।
महत्वपूर्ण तथ्य
यह मामला उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में एक अस्पताल में अवैध सेक्स डिटर्मिनेशन की शिकायत से उत्पन्न हुआ। जिला मजिस्ट्रेट, जो Appropriate Authority के रूप में कार्य कर रहे थे, ने एक डिकॉय ऑपरेशन को अधिकृत किया, जिससे डॉक्टर के खिलाफ छापेमारी और FIR दर्ज हुई। आरोपी ने अलाहाबाद हाई कोर्ट में चार्ज शीट को चुनौती दी, जिसने स्पष्टता के लिए मामले को Supreme Court को भेजा।
कोर्ट ने जोर दिया कि धारा 27 और 28 की भाषा, जब साथ में पढ़ी जाती है, तो यह स्पष्ट विधायी इरादा दर्शाती है कि जांचें विशेषीकृत प्रणाली के भीतर ही रहें। नियम 18A(3)(iv) के अनुसार पुलिस सहायता केवल पूरक रूप में ही अनुमति है, जो अब वैधानिक शक्ति रखता है।
UPSC प्रासंगिकता
यह निर्णय सीधे GS से संबंधित है