<h3>Overview</h3>
<p>The 2026 संशोधन to the Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 ने व्यापक भ्रम और डर पैदा किया है। पहली बार NALSA judgment के बाद, कानून लिंग पहचान को एक मेडिकल बोर्ड और जिला मजिस्ट्रेट के नियंत्रण में रखने का प्रयास करता है। यह उलटफेर संविधानिक गारंटी जैसे Article 21 और स्व‑पहचान सिद्धांत को चुनौती देता है।</p>
<h3>Key Developments</h3>
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<li><strong>30 March 2026</strong> को गजेट सूचना ने मेडिकल बोर्ड से पहले अनिवार्य मूल्यांकन लागू किया, जिसके बाद जिला मजिस्ट्रेट को ट्रांसजेंडर प्रमाणपत्र के लिए सिफारिश की जाएगी।</li>
<li>संशोधन लिंग पहचान में “अत्यधिक प्रभाव” को आपराधिक बनाता है, जिसके दंड <strong>15 साल की जेल</strong> तक हो सकते हैं।</li>
<li>यह ट्रांसजेंडर, इंटरसेक्स और हिजड़ा समुदायों के बीच अंतर को मिटा देता है, जिससे ट्रांस पुरुषों को हाशिए पर धकेला जाता है।</li>
<li>2019 अधिनियम के तहत मौजूदा कल्याण प्रावधान—शिक्षा, स्वास्थ्य‑सेवा पहुंच, आवास और कौशल‑विकास योजनाएँ—संभावित रूप से घटाए जा सकते हैं।</li>
</ul>
<h3>Important Facts</h3>
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<li>~99% ट्रांसजेंडर व्यक्तियों ने सामाजिक अस्वीकृति की रिपोर्ट की है; 52% शैक्षणिक संस्थानों में उत्पीड़न का सामना करते हैं; 57% ट्रांस महिलाओं को शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव होता है।</li>
<li>आत्महत्या का प्रयास</li>
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