समीक्षा
भारत ने 1960 के दशक में खाद्य‑सहायता पर निर्भर राष्ट्र से एक प्रमुख खाद्य उत्पादक के रूप में परिवर्तन किया है, जो लगभग 1.4 अरब लोगों को पोषण देता है। यह उपलब्धि NFSA, बीज, सिंचाई, खरीद, भंडारण और PDS में सार्वजनिक निवेश पर आधारित है। जलवायु परिवर्तन अब इस प्रणाली को खतरे में डाल रहा है, जिससे जलवायु‑प्रतिरोधी खाद्य‑सुरक्षा ढांचे की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
मुख्य विकास
- भोजन अनाज उत्पादन ने 2024‑25 में 350 मिलियन टन को पार किया, जिसमें रिकॉर्ड चावल और गेहूँ उत्पादन हुआ।
- डिजिटलीकरण और ONORC ने PDS अधिकारों की पहुँच और पोर्टेबिलिटी को विस्तारित किया है।
- नीति का फोकस चावल‑गेहूँ केंद्रित खरीद से एक विविध टोकरी की ओर बदल रहा है, जिसमें millets, दालें, तेल बीज और अन्य पोषक‑अनाज शामिल हैं।
- India Meteorological Department के पूर्वानुमानों को खरीद और बफ़र‑स्टॉक निर्णयों से जोड़ना।
- climate‑indexed insurance, माइक्रो‑सिंचाई, प्रिसीजन फार्मिंग और डिजिटल सलाहकारों को बढ़ावा देना।
- green bonds, अनुकूलन फंड और बीमा योजनाओं के माध्यम से वित्तपोषण।
महत्वपूर्ण तथ्य
वर्तमान खरीद प्रणाली कुछ फसलों (चावल, गेहूँ) और क्षेत्रों में केंद्रित है, जहाँ गंभीर भूजल तनाव भी है। खरीद में विविधता लाने से जोखिम का संकेंद्रण कम हो सकता है, आहार विविधता में सुधार हो सकता है और मूल्य समर्थन को स्थानीय जल‑उपलब्धता के साथ संरेखित किया जा सकता है। बाढ़‑प्रतिरोधी गोदाम, तापमान‑सहिष्णु भंडारण, विस्तारित कोल्ड‑चेन और मजबूत परिवहन आवश्यक हैं क्योंकि खाद्य टोकरी विस्तृत हो रही है।
UPSC प्रासंगिकता
भारत की खाद्य‑सुरक्षा संरचना को समझना GS III (Economy) और GS II (Polity) के कल्याण योजनाओं, सार्वजनिक वितरण और जलवायु नीति से संबंधित प्रश्नों के लिए अत्यावश्यक है। “सतत खाद्य सुरक्षा” मॉडल की ओर बदलाव दर्शाता है कि नीति डिजाइन कैसे जलवायु जोखिम को एकीकृत करता है (GS III) a