Supreme Court 1998 Uttarakhand गैंग‑रेप सज़ाओं को उलट देता है – एकल गवाही की जांच
समीक्षा
अत्युच्च न्यायालय, दो‑जज की बेंच Justices Pankaj Mithal और Prasanna B. Varale के माध्यम से, अप्रैल 1998 से शुरू हुए गैंग‑रेप मामले में चार आरोपी की सज़ा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन का मामला, जो केवल prosecutrix की देर से दी गई गवाही पर आधारित था, सज़ा के लिए आवश्यक भरोसे को नहीं रखता था।
मुख्य विकास
- अपील सुनी गई Uttarakhand High Court के फैसले के खिलाफ, जिसने 2012 में सज़ा को बरकरार रखा था।
- मूल परीक्षण (2000) में चार आरोपी को 10 साल की कठोर कारावास और जुर्माना सुनाया गया।
- दो आरोपी Supreme Court के आदेश देने से पहले ही मर गए।
- कोर्ट ने Vijayan v. State of Kerala के स्थापित पूर्वनिर्णय पर भरोसा किया और अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया।
महत्वपूर्ण तथ्य
घटना का समयरेखा – कथित हमला 7 April 1998 को हुआ। पीड़िता ने 31 July 1998 को लिखित शिकायत दर्ज की, लगभग तीन महीने की देरी के साथ। इस देरी के बाद FIR (First Information Report) दायर किया गया।
आरोपी – Rajendra, Pappu alias Hanuman, Sushil Kumar और Kishan।
अभियोजन का संस्करण – पीड़िता ने दावा किया कि उसे गला बंद कर दिया गया, आँखों पर पट्टी बांधी गई, और एक खाली प्लॉट में ले जाया गया जहाँ चार पुरुषों ने क्रमशः उसका बलात्कार किया।
रक्षा के तर्क – उजागर किया (i) शिकायत दाखिल करने में तीन‑महीने की देरी, (ii) पीड़िता का परिवार या मित्रों से बात न करना, (iii) उसके बयानों में असंगतियां (कमरा बनाम प्लॉट), (iv) घनी आबादी वाले क्षेत्र में घटना होने के बावजूद कोई स्वतंत्र गवाह न होना, और (v) पूर्व में जल‑आपूर्ति विवाद जो संभावित झूठी फँसाव की ओर संकेत करता है।
UPSC प्रासंगिकता
यह मामला सिविल सर्विसेज परीक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण अवधारणाओं को दर्शाता है:
- Sole testimony और इसकी सीमाएँ।
- Corroborative evidence – अतिरिक्त प्रमाण (चिकित्सा रिपोर्ट, आँख‑गवाह)