Supreme Court of India एक याचिका की सुनवाई कर रहा है जो Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 में लैंगिक पक्षपात को प्रश्न करती है। Court ने चेतावनी दी कि यदि इस अधिनियम को निरस्त किया गया तो Muslim महिलाओं के लिए एक legal vacuum बन सकता है, और Indian Succession Act (ISA) को विकल्प के रूप में सुझाया। इससे UCC की दीर्घकालिक माँग फिर से उठी है, लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों में सुधार अधिक स्थायी समाधान है।
मुख्य विकास
- याचिका 1937 अधिनियम की उत्तराधिकार प्रावधानों को महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण मानती है।
- Supreme Court ने एक "legal vacuum" के जोखिम को उजागर किया है यदि अधिनियम को बिना विकल्प के निरस्त किया जाए।
- Law Commission of India ने तुरंत UCC लागू करने के बजाय आंतरिक सुधारों की सिफारिश की है।
- Hindu, Parsi और Christian उत्तराधिकार कानूनों में समानांतर सुधारों की माँग की गई है।
महत्वपूर्ण तथ्य
• 1937 अधिनियम राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के लिए एक समान ढांचा प्रदान करने के लिए बनाया गया था, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रीति‑रिवाजों के टुकड़े‑टुकड़े होने से बचा जा सके।
• Mahatma Gandhi, Jawaharlal Nehru और B. R. Ambedkar जैसे नेताओं ने legal pluralism का समर्थन किया, UCC को Directive Principles में रखा और इसे तुरंत लागू करने योग्य नहीं बनाया।
• Hindu Succession Act, 1956 (2005 में संशोधित) अभी भी सह‑वारिसी की अवधारणा और बेटियों के अधिकारों के बारे में अस्पष्टता रखता है।
• ISA की धारा 15 महिला के वारिसों को केवल पुरुष रिश्तेदारों के संदर्भ में परिभाषित करती है, जिससे असमान परिणाम होते हैं, जैसा कि Om Prakash v. Radhacharan (2008) में दिखाया गया है।
UPSC प्रासंगिकता
Legal pluralism और Uniform Civil Code के लिए धकेल के बीच तनाव को समझना, ...
