Supreme Court के हालिया निर्णयों ने मासिक धर्म को संवैधानिक बहस के केंद्र में रखा है, जैव विज्ञान, कानून और लिंग समानता को जोड़ते हुए। जबकि कोर्ट अपने 2018 फैसले की समीक्षा पर अंतिम तर्क सुन रहा है, जिसने Sabarimala temple को मासिक धर्म आयु वाली महिलाओं के लिए खोल दिया था, इसने 13 मार्च 2026 को राष्ट्रीय स्तर पर menstrual leave लागू करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि एक वैधानिक आदेश नियोक्ताओं को महिलाओं को नियुक्त करने से हतोत्साहित कर सकता है।
Key Developments
- अंतिम तर्क 2018 Sabarimala निर्णय की समीक्षा के लिए दायर याचिका पर सुने जा रहे हैं, जिसने 10‑50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी।
- Court के 13 मार्च 2026 के आदेश ने भारत में menstrual leave को अनिवार्य बनाने से इनकार कर दिया, संभावित नकारात्मक प्रभावों को महिलाओं की रोजगार क्षमता पर उद्धृत करते हुए।
- पहले के निर्णय (जैसे 2016 Bombay High Court का Haji Ali Dargah संबंधी फैसला) ने संविधान के Articles 14, 15, 25 के तहत धार्मिक स्थानों में लिंग‑आधारित प्रतिबंधों को निरस्त किया।
Important Facts
मासिक धर्म, यद्यपि एक प्राकृतिक जैविक कार्य है, इसे सामाजिक पदानुक्रमों को लागू करने के लिए biological determinism के माध्यम से उपयोग किया गया है। Richard Lewontin जैसे विद्वानों ने इस तर्क को 19वीं सदी की शारीरिक विज्ञान के उपयोग से जोड़ा है, जो लिंग और जाति उत्पीड़न को तर्कसंगत बनाता था। भारत में सांस्कृतिक प्रथाएँ—असम, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में उत्सवात्मक अनुष्ठानों से लेकर उन टैबू तक जो मासिक धर्म वाले शरीर को “अशुद्ध” कहती हैं—लिंग आधारित सामाजिकरण को आकार देती हैं, जैसा कि Leela Dube और Rituparna Patgiri ने तर्क दिया है।
